
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और प्रसिद्ध त्योहार पोला न केवल इस राज्य में, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है. यह पर्व विशेष रूप से किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए समर्पित है, जिसमें उनके सबसे महत्वपूर्ण साथी, बैलों की पूजा की जाती है. इस साल बैल पोला का त्योहार 2 सितंबर को भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाएगा. भारत, जो कि एक कृषि प्रधान देश है, में बैल सदियों से खेती के अभिन्न अंग रहे हैं. किसान बैलों की मदद से खेत की जुताई करते हैं और अन्न बोते हैं, जिससे धरती हरी-भरी हो जाती है. गाय और बैल को लक्ष्मी के रूप में देखा जाता है, और इन्हें सदैव पूजनीय माना गया है। पोला के इस पावन पर्व में बैलों की पूजा की जाती है.
इस त्योहार में बैलों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। जिनके पास बैल नहीं होते, वे मिट्टी के बैल बनाकर उनकी पूजा करते हैं. जिनके घर में बैल होते हैं, वे उन्हें अर्ध जल अर्पित करते हैं, माथे पर चंदन का टीका लगाते हैं, और उन्हें माला पहनाई जाती है.इसके साथ ही बैलों को विशेष रूप से तैयार भोजन दिया जाता है और धूप-अगरबत्ती के साथ उनकी पूजा की जाती है.
बैलों की पूजा का यह त्योहार मनाया जाता है
हमारा देश कृषि प्रधान है, और सदियों से खेती-बाड़ी में बैलों की मदद ली जाती रही है. यद्यपि आधुनिक युग में मशीनों का प्रयोग बढ़ गया है, फिर भी यह परंपरा आज भी जीवित है कि बैलों के बिना खेती अधूरी है. पंडित तिवारी जी ने बताया.कि स्वयं महादेव भी बैल नंदी पर सवार होते हैं, इसलिए बैलों की पूजा का यह त्योहार मनाया जाता है.